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मनोविज्ञान के बारे में  पेश हैं कुछ रोचक और हैरान कर देने वाले मनोवैज्ञानिक तथ्य


1. अगर किसी इंसान को कोई काम करने की लिए मना किया जाये तो वह इंसान सबसे पहले उसी काम को करने के बारे में जरूर सोचता है।

2. दुनियाँ में 85% लोग सोने से पहले वो सब सोचते हैं जो वो अपने जीवन में करना चाहते हैं।

3. एक स्टडी में उजागर हुआ है कि 72% लोगो के दिमाग में क्रिएटिव आइडियाज बाथरूम में शावर लेते समय आते है।

4. सुबह सूर्य के रोशनी में ज्यादा समय बिताने वालों को तनाव, Depression कम होता है।

5. मनोविज्ञान के अनुसार ज्यादातर लोग सच्ची घटनाओं से ज्यादा अपवाहों पर यकीन करते है।

6. डिप्रेश होना बहुत ज्यादा सोचने का परिणाम है। जब हम अवसाद में जाते हैं तब हमारा दिमाग उन समस्याओं के निर्कमाण में लग जाता है जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है।

7. यदि कोई व्यक्ति छोटी छोटी बातों पर भी ज्यादा हँसता है तो वो अपने आप को अंदर से अकेला महसूस करता है।

8. हमारा दिमाग जितना दिन में चलता है उससे तेज़ वो रात में वो भी सोते समय चलता है। इसके आलावा अकेला शरीर में सबसे ज्यादा ऊर्जा की खपत करता है।

9. मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जिन लोगों को अपनी मातृ भाषा के आलावा कोई अन्य भाषा भी आती है वे लोग ज्यादा बेहतर तरीके से निर्णय लेने में सक्षम रहते हैं।

10. आप जितने ज्यादा ठन्डे कमरे में सोयेंगे, रात को उतने ही डरावने सपने आने की संभावनाएं बढ़ेगी।

यदि आपका मन अक्सर भटकता है तो 85% संभावना है आप अपने अवचेतन मन से दुखी है।

11. जो लोग हमेशा अवसाद से ग्रसित होते हैं वह बहुत से रंग़ों को समझ नहीं पाते और ना ही उनमें अंतर कर पाते हैं। ऐसे लोगों की रंगों के प्रति संवेदनशीलता भी समाप्त हो जाती है।

12. किसी के साथ ज्यादा समय बिताने से आप उसकी आदतें अपनाने लगते हैं।

13. जितनी चिंता आजकल के बच्चे दिखाते हैं उतनी चिंता 1950 में दिमागी मरीज़ दिखाते हैं।

14. यदि कोई असामान्य तरीके से खाना खाता है यानि वो किसी बात को लेकर बहुत चिंतित है।

15. नकारात्मक सोच (Negative Thinking) आपके माता-पिता से मिले किसी gene का परिणाम भी हो सकते हैं।

16. कुछ लोगों को सिर्फ 4 मिनट में प्यार हो जाता है. ये बात साइकोलॉजिकल तौर पर सिद्ध हो चुकी है।

17. हास्य अभिनेता (Comedian) दूसरों के मुकावले ज्यादा दुखी रहते हैं।

18. जितनी ज्यादा आप किसी के लिए Feelings को छुपाओगे उतनी ज्यादा वो आपके लिए बढ़ेगी।

19. हमारा 70% मस्तिष्क केवल पुरानी यादों के सहारे एक बढ़िया माहौल बनाने की कोशिश करता रहता है।

20. 18 साल से 33 साल की उम्र तक व्यक्ति सबसे ज्यादा तनाव में रहता है।

21. आप उस शख्स से कभी झूठ बोलना पसंद नहीं करते जिससे आप बहुत ज्यादा प्यार करते है।

22. देर रात को बात करने पर ज्यादातर लोग सच बोलते हैं क्योंकि थका हुआ होने के कारण दिमाग ज्यादा सोचता नहीं है और ईमानदारी से जबाब देता है।

23. अगर आपने अपने प्लान या योजनाएं किसी को बताई तो उनके पूरे होने की संभावना न्यूनतम होती है। इसलिए कहते हैं काम पूरा होने से पहले किसी को बताना नहीं चाहिए।

24. आपके कपड़े पहनने का असर आपके मूड पर होता है। यदि आप अच्छे कपडे पहनते है तो आपका मूड अच्छा रहता है।

25. यदि कोई इंसान किसी के बारे में सबसे ज्यादा बात (अच्छाई या बुराई) करता है तो इसका मतलब है वो उस इंसान से प्रभावित है।


गुरु चेलो की बड़ी मजेदार कथा है हसंते हंसते लोट पोट हो जाओगे बड़ा आनंद आएगा सुनकर

🍁 संगति का प्रभाव 🍁

एक राजा का तोता मर गया। उन्होंने कहा-- मंत्रीप्रवर! हमारा पिंजरा सूना हो गया। इसमें पालने के लिए एक तोता लाओ।

तोते सदैव तो मिलते नहीं। राजा पीछे पड़ गये तो मंत्री एक संत के पास गये और कहा-- भगवन्!

राजा साहब एक तोता लाने की जिद कर रहे हैं। आप अपना तोता दे दें तो बड़ी कृपा होगी। संत ने कहा- ठीक है, ले जाओ।

राजा ने सोने के पिंजरे में बड़े स्नेह से तोते की सुख-सुविधा का प्रबन्ध किया।

तोता ब्रह्ममुहूर्त में  बोलने लगा--  जय श्री राम ,,,   ओम् तत्सत्....ओम् तत्सत् ... उठो राजा! उठो महारानी!

दुर्लभ मानव-तन मिला है। यह सोने के लिए नहीं, भजन करने के लिए मिला है।

चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसै तिलक देत रघुबीर।।'

कभी रामायण की चौपाई तो कभी गीता के श्लोक उसके मुँह से निकलते। पूरा राजपरिवार बड़े सवेरे उठकर उसकी बातें सुना करता था। राजा कहते थे कि तोता क्या मिला, एक संत मिल गये।

हर जीव की एक निश्चित आयु होती है। एक दिन वह तोता मर गया। राजा, रानी, राजपरिवार और पूरे राष्ट्र ने हफ़्तों शोक मनाया। झण्डा झुका दिया गया।

किसी प्रकार राजपरिवार ने शोक संवरण किया और राजकाज में लग गये। पुनः राजा साहब ने कहा-- मंत्रीवर ! खाली पिंजरा सूना-सूना लगता है, एक तोते की व्यवस्था करें!

मंत्री ने इधर-उधर देखा, एक कसाई के यहाँ वैसा ही तोता एक पिंजरे में टँगा था। मंत्री ने कहा कि राजा साहब चाहते की ये तोता उन्हें मिले।

कसाई ने कहा कि हम आपके राज्य में ही तो रहते हैं। हम नहीं भी देंगे तब भी आप उठा ही ले जायेंगे।

मंत्री ने कहा-- नहीं नहीं, हमारी विनती है।

कसाई ने बताया कि किसी बहेलिये ने एक वृक्ष से दो तोते पकड़े थे। एक को उसने महात्माजी को दे दिया था और दूसरा मैंने खरीद लिया था। राजा को चाहिये तो आप ले जाएं।

अब कसाईवाला तोता राजा के पिंजरे में पहुँच गया।

राजपरिवार बहुत प्रसन्न हुआ। सबको लगा कि वही तोता जीवित होकर चला आया है।

दोनों की नासिका, पंख, आकार, चितवन सब एक जैसे थे। लेकिन बड़े सवेरे तोता उसी प्रकार राजा को बुलाने लगा जैसे वह कसाई अपने नौकरों को उठाता था कि..

उठ ! हरामी के बच्चे! राजा बन बैठा है। मेरे लिए ला अण्डे, नहीं तो पड़ेंगे डण्डे!

ये ही बात बार बार दोहराने लगा राजा को इतना क्रोध आया कि उसने तोते को पिंजरे से निकाला और गर्दन मरोड़कर किले से बाहर फेंक दिया।

दोनों तोते, सगे भाई थे। एक की गर्दन मरोड़ दी गयी, तो दूसरे के लिए झण्डे झुक गये, भण्डारा किया गया, शोक मनाया गया।

आखिर भूल कहाँ हो गयी ? अन्तर था तो संगति का ! सत्संग की कमी थी।

संगत ही गुण होत है, संगत ही गुण जाय।
बाँस फाँस अरु मीसरी, एकै भाव बिकाय।।

पूरा सद्गुरु ना मिला, मिली न साँची सीख।
भेष जती का बनाय के, घर-घर माँगे भीख।

शिक्षा :- अपने बच्चों को उच्चशिक्षा के साथ साथ अच्छे संस्कार भी दीजिए ताकि वो जहां भी जाये सबका समान करे और अपने आचरण से खुद के साथ परिवार का नाम भी रोशन करे ।

राम..!
शब्द में दो अर्थ व्यंजित हैं,*सुखद होना..! और ठहर जाना..!!*
अपने मार्ग से भटका हुआ कोई क्लांत पथिक किसी सुरम्य स्थान को देखकर ठहर जाता है।
हमने सुखद ठहराव का अर्थ देने वाले जितने भी शब्द गढ़े सभी में राम अंतर्निहित है.
यथा,
आराम..!
विराम..!
विश्राम..!
अभिराम..!
उपराम..!
ग्राम..!
जो रमने के लिए विवश कर दे वह राम..!
जीवन की आपाधापी में पड़ा अशांत मन जिस आनंददायक गंतव्य की सतत तलाश में है, वह गंतव्य है राम..!
भारतीय मन हर स्थिति में राम को साक्षी बनाने का आदी है।
👉दुःख में,
हे राम..!
👉पीड़ा में,
हे राम..!
👉लज्जा में,
हाय राम..!
👉अशुभ में,
अरे राम राम..!
👉अभिवादन में,
राम राम..!
👉शपथ में,
रामदुहाई..!
👉अज्ञानता में,
राम जाने..!
👉अनिश्चितता में,
राम भरोसे..!
👉अचूकता के लिए,
रामबाण..!
👉मृत्यु के लिए,
रामनाम सत्य..!
👉सुशासन के लिए,
रामराज्य..!
जैसी अभिव्यक्तियां पग-पग पर राम को साथ खड़ा करतीं हैं।
राम भी इतने सरल हैं कि हर जगह खड़े हो जाते हैं।
हर भारतीय उन पर अपना अधिकार मानता है।
👉जिसका कोई नहीं उसके लिए राम हैं-
निर्बल के बल राम..!
असंख्य बार देखी सुनी पढ़ी जा चुकी रामकथा का आकर्षण कभी नहीं खोता।
राम पुनर्नवा हैं।
हमारे भीतर जो कुछ भी अच्छा है, वह राम है।
जो शाश्वत है, वह राम हैं।
सब-कुछ लुट जाने के बाद जो बचा रह जाता है वही तो राम है।
घोर निराशा के बीच जो उठ खड़ा होता है वह भी राम ही है।
सीमाओं के बीच छुपे असीम को देखना हो तो राम को देखिए..!!
जय सियाराम
सियाराम मय सब जग जानी करहूँ प्रणाम जोरि जुग पानी।
जय जय श्री राम

"साधन धाम मोक्ष कर द्वारा।
सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थनि गावा।"
साधक की मंजिल मोक्ष है और वहाँ तक पहुँचने का द्वार साधना है। सौभाग्य की बात है हमें मनुष्य शरीर मिला है।
"बड़े भाग्य मनुष्य तन पावा ।
सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थन् गावा।"
हमें बड़े सौभाग्य से मनुष्य का शरीर मिला है। मनुष्य शरीर पाकर ही हम साधना कर सकते है और अपने साध्य तक पहुँच सकते है। हमारी मंजिल(साध्य) परमात्मा है। परमात्मा को पाने के लिए तन से सत्कर्म और मन से प्रभु भजन करना चाहिए। जीवन निष्पाप, निष्कपट, निराभिमान और प्रभु प्रेम में रंगा होना चाहिए । इससे मोक्ष का द्वार खुलता है। मोक्ष का अर्थ है- मोह +क्ष अर्थात् अज्ञान का नष्ट हो जाना । शरीर साधन है साध्य नहीं । जीवन का साध्य परम तत्व परमात्मा की प्राप्ति है। जो प्रत्येक शरीर के भीतर आत्मा के रूप में विघ्यमान है। मनुष्य तन पाकर हम सद् बुद्धि का आश्रय लेते हुए मन को निष्पाप, निर्विकल्प और शांत करके बुद्धि को विचारों के जमघट से हटा कर शुद्धतम् अंतःकरण में परमात्मा को आत्मा के रूप में अनुभव कर सकते है। मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है। गुरुवाणी में कहा है-
" सकल धर्म मह स्रश्रेष्ठ धर्म
हर का नाम जप निर्मल कर्म।"
हमारे कर्म निष्पाप हो और जीवन प्रभु प्रेम में रंगा हो तो फिर मंजिल दूर नहीं ।

पुज्या श्री गुरुदेव.

सत्य कथा एक बार अवश्य पढ़ें👇

श्री अयोध्या जी में 'कनक भवन' एवं 'हनुमानगढ़ी' के बीच में एक आश्रम है जिसे 'बड़ी जगह' अथवा 'दशरथ महल' के नाम से जाना जाता है। काफी पहले वहाँ एक सन्त रहा करते थे जिनका नाम था श्री रामप्रसाद जी। उस समय अयोध्या जी में इतनी भीड़ भाड़ नहीं होती थी। ज्यादा लोग नहीं आते थे। श्री रामप्रसाद जी ही उस समय बड़ी जगह के कर्ता धर्ता थे। वहाँ बड़ी जगह में मन्दिर है जिसमें पत्नियों सहित चारों भाई (श्री राम, श्री लक्ष्मण, श्री भरत एवं श्री शत्रुघ्न जी) एवं हनुमान जी की सेवा होती है। चूंकि सब के सब फक्कड़ सन्त थे .... तो नित्य मन्दिर में जो भी थोड़ा बहुत चढ़ावा आता था उसी से मन्दिर एवं आश्रम का खर्च चला करता था।

प्रतिदिन मन्दिर में आने वाला सारा चढ़ावा एक बनिए को (जिसका नाम था पलटू बनिया) भिजवाया जाता था। उसी धन से थोड़ा बहुत जो भी राशन आता था.... उसी का भोग-प्रसाद बनकर भगवान को भोग लगता था और जो भी सन्त आश्रम में रहते थे वे खाते थे।एक बार प्रभु की ऐसी लीला हुई कि मन्दिर में कुछ चढ़ावा आया ही नहीं। अब इन साधुओं के पास कुछ जोड़ा गांठा तो था नहीं... तो क्या किया जाए ..? कोई उपाय ना देखकर श्री रामप्रसाद जी ने दो साधुओं को पलटू बनिया के पास भेज के कहलवाया कि भइया आज तो कुछ चढ़ावा आया नहीं है... अतः थोड़ा सा राशन उधार दे दो... कम से कम भगवान को भोग तो लग ही जाए। पलटू बनिया ने जब यह सुना तो उसने यह कहकर मना कर दिया कि मेरा और महन्त जी का लेना देना तो नकद का है... मैं उधार में कुछ नहीं दे पाऊँगा।

श्री रामप्रसाद जी को जब यह पता चला तो "जैसी भगवान की इच्छा" कहकर उन्होंने भगवान को उस दिन जल का ही भोग लगा दिया। सारे साधु भी जल पी के रह गए।प्रभु की ऐसी परीक्षा थी कि रात्रि में भी जल का ही भोग लगा और सारे साधु भी जल पीकर भूखे ही सोए।वहाँ मन्दिर में नियम था कि शयन कराते समय भगवान को एक बड़ा सुन्दर पीताम्बर ओढ़ाया जाता था तथा शयन आरती के बाद श्री रामप्रसाद जी नित्य करीब एक घण्टा बैठकर भगवान को भजन सुनाते थे। पूरे दिन के भूखे रामप्रसाद जी बैठे भजन गाते रहे और नियम पूरा करके सोने चले गए।

धीरे-धीरे करके रात बीतने लगी। करीब आधी रात को पलटू बनिया के घर का दरवाजा किसी ने खटखटाया। वो बनिया घबरा गया कि इतनी रात को कौन आ गया। जब आवाज सुनी तो पता चला कुछ बच्चे दरवाजे पर शोर मचा रहे हैं–'अरे पलटू... पलटू सेठ ... अरे दरवाजा खोल...।' उसने हड़बड़ा कर खीझते हुए दरवाजा खोला। सोचा कि जरूर ये बच्चे शरारत कर रहे होंगे... अभी इनकी अच्छे से डांट लगाऊँगा।जब उसने दरवाजा खोला तो देखता है कि–चार लड़के जिनकी अवस्था बारह वर्ष से भी कम की होगी .... एक पीताम्बर ओढ़ कर खड़े हैं।*

वे चारों लड़के एक ही पीताम्बर ओढ़े थे। उनकी छवि इतनी मोहक .... ऐसी लुभावनी थी कि ना चाहते हुए भी पलटू का सारा क्रोध प्रेम में परिवर्तित हो गया और वह आश्चर्य से पूछने लगा–'बच्चों ...! तुम हो कौन और इतनी रात को क्यों शोर मचा रहे हो...?'

बिना कुछ कहे बच्चे घर में घुस आए और बोले–हमें रामप्रसाद बाबा ने भेजा है। ये जो पीताम्बर हम ओढ़े हैं... इसका कोना खोलो... इसमें सोलह सौ रुपए हैं... निकालो और गिनो।' ये वो समय था जब आना और पैसा चलता था। सोलह सौ उस समय बहुत बड़ी रकम हुआ करते थे। जल्दी-जल्दी पलटू ने उस पीताम्बर का कोना खोला तो उसमें सचमुच चांदी के सोलह सौ सिक्के निकले। प्रश्न भरी दृष्टि से पलटू बनिया उन बच्चों को देखने लगा। तब बच्चों ने कहा–'इन पैसों का राशन कल सुबह आश्रम भिजवा देना।

अब पलटू बनिया को थोड़ी शर्म आई–'हाय...! आज मैंने राशन नहीं दिया... लगता है महन्त जी नाराज हो गए हैं... इसीलिए रात में ही इतने सारे पैसे भिजवा दिए।' पश्चाताप, संकोच और प्रेम के साथ उसने हाथ जोड़कर कहा–'बच्चों..! मेरी पूरी दुकान भी उठा कर मैं महन्त जी को दे दूँगा तो भी ये पैसे ज्यादा ही बैठेंगे। इतने मूल्य का सामान देते-देते तो मुझे पता नहीं कितना समय लग जाएगा। बच्चों ने कहा–'ठीक है... आप एक साथ मत दीजिए... थोड़ा-थोड़ा करके अब से नित्य ही सुबह-सुबह आश्रम भिजवा दिया कीजिएगा... आज के बाद कभी भी राशन के लिए मना मत कीजिएगा।' पलटू बनिया तो मारे शर्म के जमीन में गड़ा जाए। वो फिर हाथ जोड़कर बोला–'जैसी महन्त जी की आज्ञा।' इतना कह सुन के वो बच्चे चले गए लेकिन जाते-जाते पलटू बनिया का मन भी ले गए।

इधर सवेरे सवेरे मंगला आरती के लिए जब पुजारी जी ने मन्दिर के पट खोले तो देखा भगवान का पीताम्बर गायब है। उन्होंने ये बात रामप्रसाद जी को बताई और सबको लगा कि कोई रात में पीताम्बर चुरा के ले गया।जब थोड़ा दिन चढ़ा तो गाड़ी में ढेर सारा सामान लदवा के कृतज्ञता के साथ हाथ जोड़े हुए पलटू बनिया आया और सीधा रामप्रसाद जी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा।

#रामप्रसाद जी को तो कुछ पता ही नहीं था। वे पूछें–'क्या हुआ... अरे किस बात की माफी मांग रहा है।' पर पलटू बनिया उठे ही ना और कहे–'महाराज रात में पैसे भिजवाने की क्या आवश्यकता थी... मैं कान पकड़ता हूँ आज के बाद कभी भी राशन के लिए मना नहीं करूँगा और ये रहा आपका पीताम्बर... वो बच्चे मेरे यहाँ ही छोड़ गए थे.... बड़े प्यारे बच्चे थे... इतनी रात को बेचारे पैसे लेकर आ भी गये... आप बुरा ना मानें तो मैं एक बार उन बालकों को फिर से देखना चाहता हूँ।' जब रामप्रसाद जी ने वो पीताम्बर देखा तो पता चला ये तो हमारे मन्दिर का ही है जो गायब हो गया था। अब वो पूछें कि–'ये तुम्हारे पास कैसे आया?' तब उस बनिया ने रात वाली पूरी घटना सुनाई। अब तो रामप्रसाद जी भागे जल्दी से और सीधा मन्दिर जाकर भगवान के पैरों में पड़कर रोने लगे कि–'हे भक्तवत्सल...! मेरे कारण आपको आधी रात में इतना कष्ट उठाना पड़ा और कष्ट उठाया सो उठाया मैंने जीवन भर आपकी सेवा की .... मुझे तो दर्शन ना हुआ ... और इस बनिए को आधी रात में दर्शन देने पहुँच गए।

जब पलटू बनिया को पूरी बात पता चली तो उसका हृदय भी धक् से होके रह गया कि जिन्हें मैं साधारण बालक समझ बैठा वे तो त्रिभुवन के नाथ थे... अरे मैं तो चरण भी न छू पाया। अब तो वे दोनों ही लोग बैठ कर रोएँ। इसके बाद कभी भी आश्रम में राशन की कमी नहीं हुई। आज तक वहाँ सन्त सेवा होती आ रही है। इस घटना के बाद ही पलटू बनिया को वैराग्य हो गया और यह पलटू बनिया ही बाद में #श्री_पलटूदास_जी के नाम से विख्यात हुए।

#श्री_रामप्रसाद_जी की व्याकुलता उस दिन हर क्षण के साथ बढ़ती ही जाए और रात में शयन के समय जब वे भजन गाने बैठे तो मूर्छित होकर गिर गए। संसार के लिए तो वे मूर्छित थे किन्तु मूर्च्छावस्था में ही उन्हें पत्नियों सहित चारों भाइयों का दर्शन हुआ और उसी दर्शन में श्री जानकी जी ने उनके आँसू पोंछे तथा अपनी ऊँगली से इनके माथे पर #बिन्दी लगाई जिसे फिर सदैव इन्होंने अपने मस्तक पर धारण करके रखा। उसी के बाद से इनके आश्रम में #बिन्दी_वाले_तिलक का प्रचलन हुआ।

वास्तव में प्रभु चाहें तो ये अभाव... ये कष्ट भक्तों के जीवन में कभी ना आए परन्तु प्रभु जानबूझकर इन्हें भेजते हैं ताकि इन लीलाओं के माध्यम से ही जो अविश्वासी जीव हैं... वे सतर्क हो जाएं... उनके हृदय में विश्वास उत्पन्न हो सके। जैसे प्रभु ने आकर उनके कष्ट का निवारण किया ऐसे ही हमारा भी कर दे..!!

🚩🌹जय सियाराम🌹🚩

भगवान बद्रीनाथ में शंख क्यों नहीं बजाया जाता कारण क्या है ?
बद्रीनाथ धाम अगर आप गए होंगे, तो ये आपने खुद गौर किया होगा यहां शंख नहीं बजाया जाता। अगर नहीं किया है, तो हम बता दें, बद्रीनाथ मंदिर में शंख नहीं बजाया जाता, वजह वैज्ञानिक, पौराणिक और धार्मिक हर तरह से जुड़ी हुई हैं। आप भी जानिए बद्रीनाथ मंदिर में शंख न बजाने की क्या है वजह।देवभूमि के नाम से मशहूर उत्तराखंड की खूबसूरती को देखने के लिए न केवल देश के लोग बल्कि विदेशी श्रद्धालु भी यहां आते हैं। उत्तराखंड को छोटे चार धाम के रूप में भी जाना जाता है, जिनमें सबसे खास बद्रीनाथ धाम है। ये धाम भगवान विष्णु को समर्पित है। ये तो आप सभी जानते होंगे कि भगवान विष्णु को शंख की ध्वनि कितनी प्रिय है, लेकिन ये जानकार आपको शायद हैरानी हो कि उनके मुख्य धाम बद्रीनाथ में शंख नहीं बजाया जाता। जी हां, मठ मंदिरों में देवी-देवताओं का पूजा-अर्चना के साथ शंख ध्वनि से भी उनका आह्वान करते हैं, लेकिन हिमालय की तलहटी पर स्थित बद्रीनाथ धाम में शंखनाद नहीं होता है।बद्रीनाथ में शंख बजाने के पीछे कई वैज्ञानिक फैक्ट जुड़े हुए हैं। ठंड के दौरान अगर आप यहां आए होंगे तो खुद देखा होगा इस समय बर्फ पड़ने लगती है। अगर यहां शंख बजता है तो उसकी ध्वनि पहाड़ों से टकराकर प्रतिध्वनि पैदा करती है। इस कारण बर्फ में दरार पड़ने या फिर बर्फीले तूफान आने की आशंका बन सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि खास आवृत्ति वाली ध्वनियाँ पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाती हैं। ऐसे में पहाड़ी इलाकों में लैंडस्लाइड भी हो सकता है। हो सकता है कि इसी वजह से यहां आदिकाल से शंख नहीं बजाया जाता।

एक कथा कहती है कि तुलसीदास जी जब हनुमान चालीसा लिखते थे लिखे पत्रों को रात में संभाल कर रख देते थे सुबह उठकर देखते तो उन में लिखा हुआ कोई मिटा जाता था।

तुलसीदास जी बहुत परेशान हुए उन्होंने हनुमान जी की आराधना की, हनुमान जी प्रकट हुए तुलसीदास ने बताया कि मैं हनुमान चालीसा लिखता हूं तो रात में कोई मिटा जाता है। हनुमान जी बोले वह तो मैं ही मिटा जाता हूं।

तुलसीदास जी श्री हनुमान जी के चरणों में गिर पड़े तो हनुमान जी ने कहा अगर प्रशंसा ही लिखनी है तो मेरे प्रभु श्री राम की लिखो मेरी नहीं, तुलसीदास जी को उस समय अयोध्याकांड का प्रथम दोहा याद आया:

“श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मन मुकुरु सुधारि

वरनउं रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि”

उन्होंने हनुमान चालीसा के प्रारंभ में उसे लिख दिया तो हनुमान जी बोले मैं तो रघुवर हूं नहीं तुलसीदास जी ने कहा आप और प्रभु श्री राम तो एक ही प्रसाद ग्रहण करने से अवतरित हुए हैं इसलिए आप भी रघुवर ही है।

तुलसीदास ने याद दिलाया कि ब्रह्म लोक में सुवर्चला नाम की एक अप्सरा रहती थी जो एक बार ब्रह्मा जी पर मोहित हो गई थी जिससे क्रुद्ध होकर ब्रह्माजी ने उसे गिद्धि होने का श्राप दे दिया था।

वह रोने लगी तो ब्रह्मा जी को दया आ गई उन्होंने कहा राजा दशरथ के पुत्र यज्ञ में हवि के रूप में जो प्रसाद तीनों रानियों में वितरित होगा तू कैकेई का भाग लेकर उड़ जाएगी मां अंजना भगवान शिव से हाथ फैला कर पुत्र कामना कर रही होगी उन्ही हाथों में वह प्रसाद गिरा देना जिससे आप अवतरित हुए।

फिर प्रभु श्री राम ने तो स्वयं आपको अपना भाई कहा है

“तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई”

तुलसीदास ने एक और तर्क दिया कि जब आप मां जानकी की खोज में अशोक वाटिका गए थे तो मां जानकी ने आपको अपना पुत्र बनाया था

“अजर अमर गुननिधि सुत होहू

करहुं बहुत रघुनायक छोहू”

जब मां जानकी की खोज करके वापस आए थे तो प्रभु श्री राम ने स्वयं आपको अपना पुत्र बना लिया था इसलिए भी आप रघुवर हुए

“सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं

देखेउं करि विचार मन माहीं”


जय जय जय बजरंगबली